जिनेवा में गूंजा सिंध का दर्द पंजाब केंद्रित नीतियों पर उठे गंभीर सवाल

जिनेवा में गूंजा सिंध का दर्द पंजाब केंद्रित नीतियों पर उठे गंभीर सवाल

अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पाकिस्तान की आंतरिक नीतियों और उसके दमनकारी रवैये के खिलाफ विरोध प्रदर्शन अब आम बात हो चली है, लेकिन जिनेवा में संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय के बाहर जो कुछ हुआ, उसने एक बार फिर पाकिस्तानी हुक्मरानों की नींद उड़ा दी है। जीय सिंध फ्रीडम मूवमेंट (Jeay Sindh Freedom Movement) के बैनर तले हुए इस प्रदर्शन में सिर्फ सिंध ही नहीं, बल्कि बलूचिस्तान, खैबर पख्तूनख्वा, सराइकी वसेब और गिलगित-बाल्टिस्तान के हक की गूंज सुनाई दी। प्रदर्शनकारियों ने सीधे तौर पर यह आरोप लगाया कि इन क्षेत्रों को सुनियोजित तरीके से पंजाबी साम्राज्यवाद का गुलाम बनाकर रखा गया है।

जब आप यह देखते हैं कि किस तरह दशकों से संसाधनों का दोहन हो रहा है, तो हैरानी नहीं होती कि लोग अब संयुक्त राष्ट्र की निगरानी में जनमत संग्रह (Referendum) की मांग क्यों कर रहे हैं। इस विरोध प्रदर्शन की अगुवाई करने वाले संगठन के चेयरमैन सोहेल अब्रो और 'वॉइस फॉर मिसिंग पर्सन्स ऑफ सिंध' के यूरोप चैप्टर के समन्वयक सारंग हैदर ने पाकिस्तान के असली चेहरे को दुनिया के सामने बेनकाब कर दिया है।

संसाधनों की लूट और मनमानी योजनाएं

पाकिस्तान के भीतर संसाधनों का बंटवारा हमेशा से विवादों में रहा है। एनएफसी (NFC) अवॉर्ड के जरिए सिंध और अन्य पिछड़े क्षेत्रों के साथ लगातार आर्थिक भेदभाव किया जा रहा है। स्थानीय लोगों के प्राकृतिक संसाधनों पर डाका डाला जा रहा है और उन्हें उनके ही हक से वंचित रखा जा रहा है। स्थिति यह है कि ऐतिहासिक भूमि को नई प्रशासनिक इकाइयों में बांटकर वहां की डेमोग्राफी बदलने की खतरनाक साजिशें रची जा रही हैं।

सिंधु नदी के पानी को लेकर चल रहा विवाद इसका सबसे ज्वलंत उदाहरण है। सिंधु के पानी पर आधिपत्य जमाने के लिए छह नई नहरों के निर्माण की योजनाएं बनाई गई हैं, जिनमें से जलालपुर नहर का निर्माण पूरी तरह अवैध तरीके से किया गया है। जब जल सुरक्षा और जीवनयापन के साधन ही छीन लिए जाएंगे, तो जनता बगावत पर उतरेगी ही। यही वजह है कि अब आत्मनिर्णय के अधिकार की मांग जोर पकड़ रही है।

जबरन गुमशुदगी और मानवाधिकारों का हनन

इस आंदोलन का सबसे डरावना पहलू मानवाधिकारों का खुला उल्लंघन है। सारंग हैदर ने जिनेवा में जो आंकड़े रखे, वे किसी भी सभ्य समाज को झकझोर देने के लिए काफी हैं। पिछले कुछ सालों में 3,500 से अधिक सिंधी राष्ट्रीय कार्यकर्ताओं का अपहरण किया जा चुका है और उनका कोई अता-पता नहीं है। 100 से ज्यादा कार्यकर्ताओं के शव बाद में बरामद हुए, जिनके शरीर पर प्रताड़ना के निशान साफ बयां करते हैं कि राज्य की एजेंसियां किस हद तक गिर चुकी हैं।

एयरपोर्ट, मुख्य सड़कें, घर और यहां तक कि शैक्षणिक संस्थान भी सुरक्षित नहीं हैं। जब छात्र और बुद्धिजीवी अपनी ही धरती पर गायब कर दिए जाएं, तो वहां लोकतंत्र का ढिंढोरा पीटना सरासर ढोंग है।

संयुक्त राष्ट्र से सीधी मांग

प्रदर्शनकारियों की मांग बिल्कुल स्पष्ट और दो टूक है। वे चाहते हैं कि संयुक्त राष्ट्र अपनी सीधी देखरेख में सिंध, बलूचिस्तान, खैबर पख्तूनख्वा, सराइकी वसेब और गिलगित-बाल्टिस्तान में जनमत संग्रह कराए। उनका मानना है कि इन क्षेत्रों की राजनीतिक तकदीर का फैसला वहां के आम लोग करेंगे, न कि इस्लामाबाद में बैठे चंद हुक्मरान। यदि जनमत संग्रह के जरिए जनता स्वतंत्र राष्ट्र का विकल्प चुनती है, तो उन्हें संयुक्त राष्ट्र का स्वतंत्र सदस्य बनने की अनुमति मिलनी चाहिए।

पाकिस्तान के हुक्मरानों को अब यह समझ लेना चाहिए कि दमन के बल पर आवाज़ को हमेशा के लिए दबाया नहीं जा सकता। जिनेवा की सड़कों पर गूंजे ये स्वर आने वाले दिनों में पाकिस्तान के लिए और बड़ी मुसीबत बन सकते हैं।

MS

Mia Smith

Mia Smith is passionate about using journalism as a tool for positive change, focusing on stories that matter to communities and society.